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राजस्‍थान की ऐतिहासिक धरती पर स्थित बांसवाड़ा जिले का एक छोटा सा गाँव, मानगढ़, आज पूरे देश के लिए वीरता, बलिदान और भक्ति का प्रतीक बन चुका है। मानगढ़ धाम केवल एक तीर्थ स्थल नहीं है, यह देशभक्ति, सामाजिक जागरूकता और आदिवासी स्वाभिमान का एक जीवंत उदाहरण है। इसे राजस्थान का जलियांवाला बाग कहा जाता है, और इसके पीछे की कहानी हर भारतीय को गर्व से भर देती है।

गोविंद गुरु और भक्ति आंदोलन की शुरुआत

गोविंद गुरु जी एक महान संत, समाज सुधारक और क्रांतिकारी विचारधारा के वाहक थे। उन्होंने 19वीं शताब्दी के अंत में बांसवाड़ा, डूंगरपुर, और आसपास के आदिवासी क्षेत्रों में भील समाज को एक नई चेतना दी। वे भील समुदाय को सामाजिक कुरीतियों से मुक्त कर देशभक्ति की ओर अग्रसर कर रहे थे।

गोविंद गुरु ने ‘सम्प सभा’ की स्थापना की, जिसमें भील समुदाय को संगठित कर शुद्ध आचरण, शराब न पीना, व्यसन मुक्त जीवन, और मातृभूमि के प्रति समर्पण जैसे सिद्धांतों का प्रचार किया गया। उनका यह आंदोलन शांतिपूर्ण था, परंतु ब्रिटिश हुकूमत को यह एक विद्रोह की तरह महसूस होने लगा।

मानगढ़ – आदिवासी क्रांति की ज्वाला

गोविंद गुरु ने मानगढ़ की पहाड़ियों को अपने आंदोलन का केन्द्र बनाया। यह क्षेत्र प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण है, चारों ओर पहाड़ियां और हरियाली फैली हुई है। यह स्थान भक्तों का संगठित स्थल बन चुका था जहाँ हज़ारों की संख्या में भील आदिवासी एकत्र होकर गोविंद गुरु के उपदेशों को सुनते थे।

ब्रिटिश सरकार को यह जमावड़ा एक चुनौती की तरह लगा और उन्होंने इसे बलपूर्वक समाप्त करने का निर्णय लिया।

17 नवंबर 1913 – बलिदान की वह काली रात

17 नवंबर 1913 की वह भयानक तारीख इतिहास में दर्ज हो गई, जब ब्रिटिश सेना ने निर्दोष आदिवासियों पर गोलियों की बौछार कर दी। कहा जाता है कि 1500 से अधिक भील भक्तों ने उस दिन देशभक्ति के लिए अपने प्राणों का बलिदान दे दिया।

यह नरसंहार भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में एक अत्यंत भावुक और प्रेरणादायक अध्याय है। इस ऐतिहासिक घटना के कारण ही मानगढ़ को राजस्थान का ‘जलियांवाला बाग’ कहा जाता है।

मानगढ़ धाम का आज का स्वरूप

आज मानगढ़ धाम एक राष्ट्रीय स्मारक बन चुका है। यहाँ गोविंद गुरु जी की भव्य प्रतिमा, एक स्मारक स्थल और स्मृति-दीवार बनाई गई है जहाँ बलिदान देने वाले भिल वीरों के नाम अंकित हैं। इस क्षेत्र को अब पर्यटन और भक्ति स्थल के रूप में विकसित किया जा रहा है।

यहाँ हर वर्ष बड़ी संख्या में श्रद्धालु, पर्यटक और इतिहासप्रेमी आते हैं। खासकर 17 नवंबर को, हजारों की संख्या में लोग यहां शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करने आते हैं।

मानगढ़ में क्या-क्या देखें?

  • गोविंद गुरु जी की प्रतिमा – उनके जीवन और आंदोलन की प्रेरणादायक झलक।
  • शहीद स्थल – जहां 1500+ वीरों ने बलिदान दिया था।
  • मानगढ़ संग्रहालय – गोविंद गुरु और सम्प सभा आंदोलन की झलक।
  • आदिवासी संस्कृति – पास के गाँवों में आपको भीलों की जीवंत संस्कृति देखने को मिलेगी।

कैसे पहुंचे मानगढ़?

  • स्थान: मानगढ़ धाम, बांसवाड़ा जिले के नजदीक, नैनवां मार्ग पर स्थित है।
  • दूरी: बूँदी से लगभग 45 किलोमीटर, डूंगरपुर और बांसवाड़ा से भी सुलभ।
  • परिवहन: निजी वाहन, टैक्सी या बस सेवा से यहाँ पहुँचना आसान है।

यात्रा का सर्वोत्तम समय

सितंबर से मार्च के बीच मानगढ़ की यात्रा सबसे उपयुक्त रहती है। इन महीनों में मौसम सुहावना होता है और आसपास की पहाड़ियाँ हरियाली से भर जाती हैं, जिससे प्राकृतिक सौंदर्य भी चरम पर होता है।

निष्कर्ष

मानगढ़ धाम केवल एक पर्यटन स्थल नहीं है, यह एक प्रेरणा-स्थल है। यह हमें बताता है कि देशप्रेम केवल बड़े शहरों या पढ़े-लिखे वर्ग तक सीमित नहीं था, बल्कि हमारे जंगलों, पहाड़ों और गांवों में रहने वाले आदिवासी भी उतने ही समर्पित थे।

यदि आप राजस्‍थान की भूमि पर वीरता, आस्था और बलिदान की कहानी देखना चाहते हैं, तो मांगरह धाम ज़रूर आइये। यहाँ की मिट्टी में देशभक्ति की खुशबू और पहाड़ियों में शहीदों की गूंज आज भी जीवंत है।