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राजस्थान की सीमांत भूमि बाड़मेर, जहां रेगिस्तान की तपन भी इतिहास की गरिमा को नहीं झुका सकी, वहीं इस धरती पर स्थित है एक ऐतिहासिक किला और दो दिव्य मंदिर – बाड़मेर गढ़ और गढ़ मंदिर (जोगमाया देवी मंदिर)। इन स्थलों की कहानी केवल ईंट-पत्थरों की नहीं, बल्कि वीरता, संस्कृति, श्रद्धा और वास्तुशिल्प की भी है।

बाड़मेर की स्थापना और इतिहास की झलक

12वीं शताब्दी में यह क्षेत्र मल्लाणी के नाम से जाना जाता था। इस क्षेत्र का वर्तमान नाम ‘बाड़मेर’ इसकी स्थापना करने वाले परमार शासक बार राव (Bahada Rao) के नाम पर पड़ा। उन्होंने बाड़मेर जिले में 25 किमी दूर स्थित जूना गांव को राजधानी बनाकर शासन की शुरुआत की।

इसके पश्चात रावल मल्लीनाथ जी के पौत्र रावत लूका और रावल मंडालक ने परमारों को हराकर जूना को अपनी राजधानी बनाया। इनके वंशज, रावत भीमा (Rawat Bhima) ने 1552 ईस्वी में वर्तमान बाड़मेर नगर की स्थापना की और राजधानी को जूना से बाड़मेर स्थानांतरित कर दिया।

बाड़मेर गढ़ – वीरता की गाथा

रावत भीमा द्वारा 1552 ई. में बनाया गया बाड़मेर गढ़, एक रणनीतिक किला है जो शहर के ऊपर स्थित एक पहाड़ी पर बना हुआ है। पहाड़ी की कुल ऊंचाई 1383 फीट है, लेकिन सुरक्षा दृष्टिकोण से किले का निर्माण 676 फीट की ऊंचाई पर किया गया।

  • किले का मुख्य प्रवेश द्वार (प्रोल) उत्तर दिशा की ओर है।
  • इसकी सुरक्षा बुर्जें पूर्व और पश्चिम दिशाओं में बनी हुई हैं।
  • किले की परिधि में पत्थर की साधारण दीवारें हैं क्योंकि प्राकृतिक पहाड़ी इसका स्वाभाविक रक्षा कवच बनती है।

इस किले से बाड़मेर शहर का विहंगम दृश्य दिखाई देता है, जो इस स्थान को न केवल ऐतिहासिक बल्कि पर्यटन की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बनाता है।

गढ़ मंदिर (जोगमाया देवी) और नागणेची माता मंदिर

इस किले की पहाड़ी पर दो अत्यंत पवित्र और प्रसिद्ध मंदिर स्थित हैं:

1. जोगमाया देवी मंदिर (गढ़ मंदिर)

  • यह मंदिर 1383 फीट की ऊंचाई पर स्थित है।
  • देवी जोगमाया शक्ति की देवी मानी जाती हैं और यहां नवरात्रि के अवसर पर विशाल मेला आयोजित होता है।
  • मंदिर तक पहुंचने के लिए भक्तों को कठिन चढ़ाई करनी पड़ती है, लेकिन मंदिर की भव्यता और वहां का आध्यात्मिक वातावरण हर थकान को हर लेता है।

2. नागणेची माता मंदिर

  • यह मंदिर पहाड़ी की 500 फीट की ऊंचाई पर स्थित है।
  • नागणेची माता को बाड़मेर राजपरिवार की कुलदेवी माना जाता है।
  • यह स्थान भी अत्यंत श्रद्धा का केंद्र है और बड़ी संख्या में भक्त यहां दर्शन हेतु आते हैं।

प्राकृतिक सौंदर्य और आध्यात्मिक ऊर्जा का संगम

बाड़मेर गढ़ की पहाड़ी न केवल इतिहास और शक्ति का प्रतीक है, बल्कि यह प्रकृति के सौंदर्य से भी भरपूर है। सुबह-सुबह यहां की हवाओं में एक अलग ही शांति और ऊर्जा महसूस होती है। पहाड़ी से दिखने वाला सूर्योदय और सूर्यास्त यहाँ के अनुभव को अविस्मरणीय बना देता है।

सांस्कृतिक और कारीगरी की भूमि

बाड़मेर आज भी अपनी लोककला, शिल्प, कसीदाकारी, काष्ठकला और अजरक प्रिंट के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है। यह क्षेत्र कभी ऊँट व्यापार मार्ग (Camel Trade Route) का केंद्र हुआ करता था, जिससे इसकी वाणिज्यिक और सांस्कृतिक सम्पन्नता का पता चलता है।

मल्लीनाथ पशु मेला – वीरता की स्मृति

बाड़मेर जिले के तिलवाड़ा गांव में प्रतिवर्ष मल्लीनाथ पशु मेला आयोजित किया जाता है। यह मेला रावल मल्लीनाथ की स्मृति में आयोजित किया जाता है जो मल्लाणी परगना के संस्थापक थे। यह मेला पशुपालकों और व्यापारियों के लिए एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और आर्थिक अवसर होता है।

कैसे पहुंचें बाड़मेर गढ़?

  • स्थान: बाड़मेर शहर, राजस्थान
  • नजदीकी रेलवे स्टेशन: बाड़मेर (BARMER)
  • नजदीकी हवाई अड्डा: जोधपुर (Jodhpur Airport), लगभग 200 किमी दूर
  • किले तक पहुंचने के लिए पैदल यात्रा करनी पड़ती है, जो रोमांचकारी अनुभव भी देता है।

क्या करें यहां?

  • किले से बाड़मेर शहर और थार रेगिस्तान का नज़ारा लें।
  • गढ़ मंदिर और नागणेची माता मंदिर में पूजा और ध्यान करें।
  • नवरात्रि में लगने वाले मेले और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लें।
  • स्थानीय हस्तशिल्प बाजार से अजरक प्रिंट, कढ़ाईदार वस्त्र, लकड़ी की कलाकृतियाँ और हस्तनिर्मित आभूषण खरीदें।

निष्कर्ष

बाड़मेर गढ़ और गढ़ मंदिर केवल ऐतिहासिक इमारतें नहीं हैं, बल्कि यह राजस्थान की वीरता, श्रद्धा और संस्कृति की जीवंत मिसाल हैं। जहां एक ओर यह किला अतीत के गौरव और शक्ति की गाथा कहता है, वहीं दूसरी ओर मंदिरों की घंटियां आपको आध्यात्मिक शांति और दिव्यता से भर देती हैं।

अगर आप राजस्थान की गहराइयों में छिपी अनमोल विरासत को जानना चाहते हैं, तो बाड़मेर गढ़ और गढ़ मंदिर की यात्रा अवश्य करें। यह स्थान आपको इतिहास, प्रकृति और भक्ति – तीनों का अद्भुत संगम प्रदान करेगा।