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राजस्थान की मिट्टी में जहां एक ओर वीरता की कहानियाँ गूँजती हैं, वहीं दूसरी ओर स्थापत्य और कला के अद्भुत उदाहरण भी हर मोड़ पर देखने को मिलते हैं। डूंगरपुर में स्थित जुना महल (Juna Mahal) भी इन्हीं अद्भुत धरोहरों में से एक है, जो अपनी सात मंज़िला बनावट, प्राचीन दीवारों और लुभावने आंतरिक सजावट के साथ एक अलग ही इतिहास रचता है।

इतिहास की शुरुआत: 13वीं सदी की राजसी बुनियाद

जुना महल का निर्माण 13वीं शताब्दी में डूंगरपुर के महाराजाओं द्वारा करवाया गया था। यह महल उस काल की राजपूत स्थापत्य कला और युद्धनीति का अद्वितीय उदाहरण है। महल का बाहरी स्वरूप एक किले जैसा प्रतीत होता है – मजबूत दीवारें, पहरेदारी के लिए मीनारें, संकरे दरवाज़े और गलियारे जो दुश्मनों की गति को धीमा करने के लिए बनाए गए थे। इसका निर्माण परेवा पत्थर (स्थानीय हरे रंग का पत्थर) से हुआ है, जो इसे एक खास पहचान देता है।

सात मंज़िलों में बसा सौंदर्य और सुरक्षा

यह महल सात मंज़िलों का है, और हर मंज़िल अपने आप में एक कहानी कहती है। ये मंज़िलें समय के साथ-साथ बनती गईं – 13वीं से लेकर 19वीं सदी तक। प्रत्येक राजा ने इसमें अपनी ज़रूरतों और कलात्मक रुचियों के अनुसार कुछ ना कुछ जोड़ा। परिणामस्वरूप यह महल सिर्फ एक निवास स्थान नहीं, बल्कि एक कला और इतिहास का जीवंत संग्रह बन गया।

बाहर से कठोर, भीतर से सजीव

जुना महल का बाहरी भाग जितना साधारण और किला-नुमा है, अंदर जाते ही दृश्य बिल्कुल बदल जाता है। भीतर कदम रखते ही दीवारों पर बने भित्तिचित्र, राजस्थानी लघुचित्र, शीशे और काँच की सजावट, और रंगीन झरोखों की दुनिया सामने आती है। हर कमरा, हर दीवार, हर छत उस समय के सौंदर्यबोध और शिल्प की मिसाल है।

महल के अंदर ग्लास इनले वर्क, फ्रेस्को पेंटिंग्स, और पारंपरिक राजस्थानी मिनिएचर पेंटिंग्स हैं, जो आज भी अपनी मूल आभा में मौजूद हैं – यद्यपि समय के थपेड़ों और उचित रखरखाव के अभाव ने कई हिस्सों को क्षतिग्रस्त कर दिया है।

रक्षा के लिए रचना

महल की बनावट पूरी तरह से रणनीतिक थी। संकरी गलियाँ, जटिल गलियारों का जाल, ऊँचे किले जैसे बाहरी द्वार – यह सब दुश्मनों को भ्रमित और धीमा करने के लिए बनाया गया था। साथ ही, यह ऊँचाई पर स्थित है, जिससे चारों ओर की निगरानी करना आसान होता था।

एक समय की शाही निवासभूमि

19वीं सदी तक जुना महल में राजपरिवार निवास करता था। बाद में, समय के साथ यह उपेक्षित होता गया और 20वीं सदी के मध्य में इसका उपयोग बंद हो गया। इसके बावजूद, यह भारत के उन चुनिंदा भवनों में से एक है जो लगातार सदियों तक आबाद रहा

आज की स्थिति: संरक्षण की पुकार

2014 में, World Monuments Watch ने जुना महल को अपनी सूची में शामिल किया था ताकि इसके ऐतिहासिक और कलात्मक महत्व की ओर ध्यान आकर्षित किया जा सके। महल आज भी बेहद सुंदर है, लेकिन समय और उपेक्षा ने इसकी कुछ दीवारों को कमजोर कर दिया है। काँच की सजावट और भित्तिचित्रों को भी कई जगह नुकसान पहुँचा है।

आज इसकी संरक्षण योजना की आवश्यकता है – ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भी इस अद्वितीय धरोहर को देख सकें और महसूस कर सकें।

क्या है खास:

  • सात मंज़िला बनावट जो बहुत ही कम जगहों पर देखने को मिलती है।
  • परेवा पत्थर की विशिष्टता।
  • मुगल और राजपूत शैली की सम्मिलित वास्तुकला।
  • दीवारों पर बनी लघु चित्रकला, काँच की सजावट और भित्तिचित्र
  • सुरक्षा और सौंदर्य का अद्भुत संगम।
  • डूंगरपुर के इतिहास को समझने का उत्कृष्ट माध्यम।

कैसे पहुँचें?

जुना महल, डूंगरपुर शहर से कुछ ही किलोमीटर दूर स्थित है और वहाँ टैक्सी या निजी वाहन से आसानी से पहुँचा जा सकता है। इसके आस-पास अरावली की पहाड़ियों की गोद में बसा यह महल एकदम शांत और सुरम्य वातावरण में स्थित है।

तो अगली बार जब आप राजस्थान की ऐतिहासिक यात्रा पर निकलें, डूंगरपुर के जुना महल को अपनी सूची में ज़रूर शामिल कीजिए। यह महल ना केवल आपको स्थापत्य की गहराई से रूबरू कराएगा, बल्कि आपको एक ऐसी दुनिया में ले जाएगा जहाँ हर दीवार एक कहानी कहती है, और हर झरोखा एक समय को जीवंत करता है।

राजस्थान की इस भूली हुई विरासत को एक नई नज़र से देखने का समय है।