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राजस्थान के माउंट आबू से लगभग 2.5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित, दिलवाड़ा जैन मंदिर न केवल एक धार्मिक स्थल है, बल्कि यह भारतीय वास्तुकला की उत्कृष्टता का प्रतीक भी है। 11वीं से 13वीं शताब्दी के बीच निर्मित ये मंदिर, सफेद संगमरमर से तराशे गए हैं और इनमें शिल्पकला की ऐसी बारीकी है जो विश्वभर के पर्यटकों और इतिहास प्रेमियों को मंत्रमुग्ध कर देती है।

इतिहास और निर्माण काल

दिलवाड़ा जैन मंदिरों का निर्माण 11वीं से 13वीं शताब्दी के मध्य हुआ। इन मंदिरों का निर्माण मुख्यतः सोलंकी वंश के शासकों और जैन धर्मावलंबियों द्वारा कराया गया था। यह मंदिर पांच प्रमुख मंदिरों का एक समूह है, जिन्हें विभिन्न तीर्थंकरों को समर्पित किया गया है।

इन मंदिरों में से सबसे प्राचीन मंदिर है:

  • विमल वसाही मंदिर, जिसका निर्माण 1031 ई. में विमल शाह ने कराया था। यह मंदिर पहले तीर्थंकर आदिनाथ को समर्पित है।

इसके बाद के महत्वपूर्ण मंदिरों में शामिल हैं:

  • लूण वसाही मंदिर – 1231 ई. में बने इस मंदिर का निर्माण वस्तुपाल और तेजपाल, दो भाईयों ने करवाया था। यह मंदिर नेमिनाथ, 22वें तीर्थंकर को समर्पित है।
  • पार्श्वनाथ मंदिर, ऋषभदेव मंदिर, और महावीर स्वामी मंदिर – ये सभी मंदिर भी लगभग इसी कालखंड में बनाए गए थे।

वास्तुकला और शिल्पकला का चमत्कार

इन मंदिरों की सबसे अनूठी बात है इनकी अति सूक्ष्म संगमरमर की नक्काशी। मंदिर की छतों, स्तंभों, द्वारों और दीवारों पर बनी जालीदार नक्काशी, फूलों की आकृतियाँ, देवी-देवताओं की मूर्तियाँ, और नृत्य मुद्राओं में उकेरे गए मानव आकृतियाँ – सभी इतनी बारीकी से तराशी गई हैं कि पत्थर जीवंत प्रतीत होता है।

विशेषताएँ:

  • रथ-प्रवेश द्वार: हर मंदिर का प्रवेश द्वार ऐसे तराशा गया है जैसे कोई रथ किसी महल में प्रवेश कर रहा हो।
  • केंद्रीय गुम्बद: हर मंदिर में एक केंद्रीय गुम्बद है जो पूरी छत को एक दृष्टि में सजीव बना देता है।
  • संगमरमर की छतें और स्तंभ: इनमें 48 खंभों पर बनी छतों की नक्काशी अद्भुत है – प्रत्येक खंभा भिन्न आकृति में बना हुआ है।

धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व

दिलवाड़ा जैन मंदिर केवल स्थापत्य का अजूबा नहीं, बल्कि जैन धर्म के लिए अत्यंत पवित्र स्थल भी है। यहाँ हर वर्ष हज़ारों श्रद्धालु और तीर्थयात्री आते हैं, विशेषकर पार्श्वनाथ जयंती और महावीर जयंती के अवसर पर।

यहाँ का ध्यान कक्ष और सभा मंडप आत्मिक शांति और ध्यान के लिए अत्यंत उपयुक्त स्थान है।

क्या देखें?

  1. विमल वसाही मंदिर – आदिनाथ को समर्पित, बारीक नक्काशी का चमत्कार
  2. लूण वसाही मंदिर – नेमिनाथ को समर्पित, लुभावनी जालीदार छतें
  3. पार्श्वनाथ मंदिर – ऊँचाई में सबसे बड़ा मंदिर
  4. महावीर स्वामी मंदिर – सूक्ष्म चित्रकला और रंगीन कांच की सजावट
  5. ऋषभदेव मंदिर – संगमरमर के सुंदर मंडप और मूर्तियाँ

समय और यात्रा सुझाव

  • खुलने का समय: सुबह 12:00 बजे से शाम 5:00 बजे तक (श्रद्धालुओं के लिए सुबह जल्दी खोला जाता है)
  • प्रवेश शुल्क: निशुल्क, लेकिन मोबाइल और कैमरा अंदर ले जाना वर्जित है
  • फोटोग्राफी: मंदिर परिसर के बाहर अनुमति है, लेकिन अंदर सख्त मनाही

यात्रा के लिए सुझाव

  • धार्मिक स्थल होने के कारण संस्कारिक और शालीन वस्त्र पहनें।
  • यहाँ शांति बनाए रखना आवश्यक है, मंदिर परिसर में मोबाइल का प्रयोग न करें।
  • मंदिर परिसर के पास संगमरमर उद्योग से जुड़ी दुकानें हैं, जहाँ से आप स्थानीय हस्तकला ले सकते हैं।

निष्कर्ष

दिलवाड़ा जैन मंदिर सिर्फ पत्थरों से बनी कोई इमारत नहीं, यह शुद्ध श्रद्धा, अतुलनीय शिल्पकला और आध्यात्मिक ऊर्जा का संगम है। यहाँ आकर आप न केवल भारत की समृद्ध वास्तुकला को निहारते हैं, बल्कि अपने भीतर भी एक अनोखी शांति और संतुलन का अनुभव करते हैं।

अगर आप माउंट आबू की यात्रा कर रहे हैं, तो दिलवाड़ा जैन मंदिर को अपनी सूची में सबसे ऊपर रखें। क्योंकि यहाँ का हर पत्थर, हर नक्काशी – सदियों पुरानी एक मौन कहानी कहती है