राजसमंद झील के शांत जल और अरावली की गोद में स्थित कांकरोली का द्वारिकाधीश मंदिर राजस्थान का एक अत्यंत पवित्र और दिव्य वैष्णव तीर्थ है। यह मंदिर न केवल भक्ति का केंद्र है, बल्कि पुष्टिमार्ग (शुद्धाद्वैत वैष्णव धर्म) का तृतीय पीठ भी माना जाता है। यहाँ प्रतिष्ठित द्वारिकाधीश प्रभु की छवि भक्तों को वही प्रेम, माधुर्य और कृपा का अनुभव कराती है, जैसा नाथद्वारा के श्रीनाथजी में मिलता है।
इतिहास – प्रभु की अनंत यात्रा से कांकरोली तक
द्वारिकाधीश प्रभु की भक्तिमय यात्रा बेहद रोचक है।
✔ प्रारंभिक पूजा – राजा अम्बरीष द्वारा
इतिहास बताता है कि राजा अम्बरीष प्रभु द्वारिकाधीश की आराधना अर्बुद पर्वत (माउंट आबू) पर करते थे। यहीं से प्रभु की यह छवि भक्तों द्वारा सुरक्षित रखकर आगे बढ़ाई गई।
✔ विभिन्न भक्तों द्वारा संरक्षण
समय के साथ कई भक्तों ने इस दिव्य मूर्ति को अपने प्रेम और श्रद्धा से संभाला।
✔ महाप्रभु वल्लभाचार्य जी से संबंध
अंततः यह दिव्य स्वरूप महाप्रभु वल्लभाचार्य जी की परंपरा तक पहुँचा, और फिर ➡ श्री वल्लभाचार्य जी के तृतीय पौत्र, श्री बालकृष्णलाल जी ने इस छवि को अपने अधीन लिया। यहीं से कांकरोली को पुष्टिमार्ग / शुद्धाद्वैत वैष्णव मत का तृतीय पीठ माना जाने लगा।
मंदिर की स्थापना – विक्रम संवत 1726
नाथद्वारा में श्रीनाथजी की तरह ही द्वारिकाधीश जी की इस मूर्ति को
✔ विक्रम संवत 1726 में
✔ कांकरोली (राजसमंद) में नए मंदिर में प्रतिष्ठित किया गया।
इस समय राजसमंद झील का निर्माण भी महाराणा राजसिंह द्वारा कराया जा चुका था, जिसके किनारे यह मंदिर शांत, पवित्र और अद्भुत वातावरण प्रदान करता है।
कांकरोली – झील किनारे बसे पवित्र धाम की सुंदरता
कांकरोली एक छोटा लेकिन अत्यंत मनोहर नगर है —
✔ राजसमंद झील के किनारे बसे होने के कारण यहाँ का वातावरण प्रकृति से भरपूर है।
✔ मंदिर की घंटियाँ, आरती का संगीत, और झील की शांति एक दिव्य अनुभूति कराते हैं।
✔ भक्तजन मानते हैं कि कांकरोली के द्वारिकाधीश जी, द्वारका के मूल स्वरूप के समान ही प्रेममयी अनुभूति देते हैं।
पुष्टिमार्ग का तृतीय पीठ – आध्यात्मिक महत्ता
कांकरोली का यह मंदिर पुष्टिमार्ग की परंपरा में एक प्रमुख स्थान रखता है।
यहाँ—
- वैष्णव परिक्रमाएँ,
- उत्सव,
- विशेष सेवाएँ,
- अष्टयाम दर्शन, विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं।
कहा जाता है कि यहाँ साक्षात श्रीनाथजी के समान कृपा स्वरूप की अनुभूति होती है।
वास्तुकला और वातावरण
मंदिर की संरचना राजस्थान की पारंपरिक शैली में निर्मित है।
✔ इसके शिखर,
✔ नक्काशीदार द्वार,
✔ शांत चौक,
✔ और झील की ओर जाती पगडंडियाँ मंदिर को और भी आध्यात्मिक बनाती हैं।
शाम के समय झील में पड़ती सूरज की किरणें जब मंदिर के शिखर पर चमकती हैं, तो परिसर अद्भुत दिव्यता से भर जाता है।
दर्शन अनुभव
यहाँ आने वाले भक्त कहते हैं: “द्वारिकाधीश जी के दर्शन से मन में असीम शांति, प्रेम और विश्वास का संचार होता है।”
- यहाँ का मंगला,
- राजभोग,
- उठापन,
- संध्या आरती वैष्णव परंपरा की अनूठी झलक प्रस्तुत करते हैं।
महत्वपूर्ण तथ्य (सार)
- स्थान: कांकरोली, राजसमंद
- स्थापना: वि.सं. 1726
- निर्माण के समय: महाराणा राजसिंह का काल
- परंपरा: पुष्टिमार्ग / शुद्धाद्वैत
- तृतीय पीठ: श्री वल्लभाचार्य परंपरा का प्रमुख स्थान
- मूर्ति का इतिहास: राजा अम्बरीष → भक्तजन → महाप्रभु वल्लभाचार्य → श्री बालकृष्णलाल जी
- प्राकृतिक सौंदर्य: राजसमंद झील के किनारे स्थित
- विशेष: दिव्य सेवाएँ और अष्टयाम दर्शन
समापन – प्रेम, भक्ति और कृपा का धाम
कांकरोली का द्वारिकाधीश मंदिर सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि प्रेम, भक्ति और कृपा का दिव्य केंद्र है। यहाँ आने वाला हर भक्त अपने हृदय में
- विश्वास,
- शांति,
- और भक्ति को लेकर लौटता है।
यदि आप राजस्थान की यात्रा कर रहे हैं, तो कांकरोली का द्वारिकाधीश मंदिर अवश्य देखने योग्य है—जहाँ प्रभु अपने भक्तों को “अनुग्रह” और “स्नेह” से भर देते हैं।