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राजस्थान के ऐतिहासिक चित्तौड़गढ़ दुर्ग में स्थित समिधेश्वर मंदिर मध्यकालीन भारत की उत्कृष्ट मंदिर वास्तुकला का एक अद्भुत उदाहरण है। यह मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि चित्तौड़ के गौरवशाली इतिहास और विभिन्न राजवंशों की सांस्कृतिक छाप को भी दर्शाता है। भगवान शिव को समर्पित यह मंदिर आज भी अपनी भव्यता, शिल्पकला और ऐतिहासिक महत्व के कारण श्रद्धालुओं और इतिहास प्रेमियों को आकर्षित करता है।

समिधेश्वर मंदिर का इतिहास

समिधेश्वर मंदिर का निर्माण 11वीं शताब्दी में मालवा के परमार शासक राजा भोज द्वारा करवाया गया था। राजा भोज को विद्वान शासक, साहित्य प्रेमी और महान निर्माता के रूप में जाना जाता है। इसी कारण यह मंदिर प्राचीन काल में विद्या, धर्म और संस्कृति का प्रमुख केंद्र रहा।

इतिहास में यह मंदिर त्रिभुवन नारायण और भोज जगती के नाम से भी प्रसिद्ध रहा है। समय-समय पर विभिन्न शासकों ने इस मंदिर में पूजा-अर्चना की और इसे संरक्षण प्रदान किया, जिससे इसका धार्मिक महत्व और अधिक बढ़ गया।

सोलंकी राजा कुमारपाल का योगदान

ईस्वी 1150 में गुजरात के सोलंकी शासक राजा कुमारपाल ने अजमेर के चौहान शासक अर्णोराज (अनो जी) को पराजित करने के बाद चित्तौड़ का दौरा किया था। इस अवसर पर उन्होंने समिधेश्वर मंदिर में भगवान शिव की पूजा की और अपनी श्रद्धा के प्रतीक स्वरूप:

  • मंदिर को एक गाँव दान में दिया
  • मंदिर परिसर में अपना अभिलेख (शिलालेख) स्थापित करवाया

यह घटना इस मंदिर के तत्कालीन राजनीतिक और धार्मिक महत्व को स्पष्ट रूप से दर्शाती है।

महाराणा मोकल द्वारा जीर्णोद्धार

समिधेश्वर मंदिर का पुनर्निर्माण एवं जीर्णोद्धार 1428 ईस्वी में मेवाड़ के शासक महाराणा मोकल द्वारा करवाया गया। इसी कारण यह मंदिर “मोकल जी का मंदिर” भी कहलाता है। महाराणा मोकल के संरक्षण में मंदिर को नई मजबूती और भव्यता प्राप्त हुई, जिससे यह लंबे समय तक सुरक्षित रह सका।

मंदिर की स्थापत्य कला और मूर्तिकला

समिधेश्वर मंदिर की वास्तुकला मध्यकालीन भारतीय शिल्प परंपरा का सुंदर उदाहरण है। मंदिर में स्थापित भगवान शिव की मूर्ति विशेष रूप से दर्शनीय है।

मंदिर की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं:

  • भगवान शिव की तीन मुखों वाली प्रतिमा, जो अद्भुत शिल्प कौशल को दर्शाती है
  • यह प्रतिमा मुंबई की एलिफेंटा गुफाओं में स्थित भगवान शिव की मुख्य मूर्ति से काफी मिलती-जुलती है
  • पत्थरों पर की गई सूक्ष्म नक्काशी और संतुलित संरचना
  • शांत और आध्यात्मिक वातावरण, जो साधना के लिए उपयुक्त है

धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व

समिधेश्वर मंदिर केवल एक पूजा स्थल नहीं, बल्कि चित्तौड़गढ़ की धार्मिक परंपरा और राजपूताना गौरव का प्रतीक है। यहाँ आने वाले श्रद्धालु भगवान शिव की आराधना के साथ-साथ उस इतिहास को भी अनुभव करते हैं, जिसने मेवाड़ को अडिग और स्वाभिमानी बनाया।

आज भी यह मंदिर चित्तौड़ दुर्ग भ्रमण के दौरान एक अनिवार्य स्थल माना जाता है और राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत में इसका विशेष स्थान है।

समिधेश्वर मंदिर हमें यह स्मरण कराता है कि राजस्थान की धरती केवल युद्धों और किलों की नहीं, बल्कि गहन आस्था, कला और आध्यात्मिक चेतना की भी भूमि रही है।