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राजस्थान की शौर्यगाथाओं, धर्म और स्थापत्य कला से समृद्ध भूमि में एक अनोखा स्थल है – दयाल शाह का किला। यह केवल एक किला नहीं, बल्कि एक नौ मंजिला जैन मंदिर था, जो अपने वैभव, धार्मिक महत्व और ऐतिहासिक घटनाओं के कारण विशेष पहचान रखता है। यह किला न केवल स्थापत्य की दृष्टि से अद्भुत है, बल्कि तेरापंथ संप्रदाय के उद्गम स्थल के रूप में भी जाना जाता है।

निर्माण का गौरवशाली इतिहास

दयाल शाह का किला आज से लगभग 320 वर्ष पहले बनवाया गया था। इसके निर्माता थे – दयाल शाह, जो मेवाड़ के महाराणा राज सिंह (1672–1680 ई.) के प्रधानमंत्री थे। उन्होंने इस शानदार जैन मंदिर-किले को एक करोड़ रुपये की लागत से एक ऊँची पहाड़ी पर बनवाया था।

इसका निर्माण उस युग में हुआ, जब कारीगरी, शिल्प और वास्तुकला अपने स्वर्णिम युग में थी। सफेद संगमरमर, बारीक नक्काशी, जैन स्थापत्य शास्त्र की विधिवत पद्धति, और इसकी नौ मंज़िलों ने इसे अपने समय का अद्वितीय स्मारक बना दिया था।

क्यों कहलाता है “किला”?

हालाँकि यह एक जैन मंदिर था, लेकिन इसकी बनावट इतनी भव्य और सुरक्षा-केंद्रित थी कि मुगल सम्राट औरंगज़ेब ने इसे राजनीतिक किला समझ लिया।
इतिहास के अनुसार, औरंगज़ेब ने इसे किला समझकर तोपों से राख कर दिया

इस घटना के पीछे धार्मिक असहिष्णुता और सत्ता की दमनकारी नीति को देखा जाता है। इस विनाश के बावजूद, यह स्थल आज भी जैन समाज के लिए आस्था और प्रेरणा का स्रोत है।

तेरापंथ संप्रदाय का उद्गम स्थल

दयाल शाह के किले की धार्मिक महत्ता केवल इसकी वास्तुकला तक सीमित नहीं है, बल्कि यह स्थान जैन धर्म के तेरापंथ संप्रदाय के जन्मस्थल के रूप में भी प्रतिष्ठित है।
जैन अनुयायियों के अनुसार, यहीं से इस संप्रदाय की विचारधारा और परंपरा की शुरुआत हुई थी, जिसने आगे चलकर सम्पूर्ण भारत में अपने सिद्धांतों के माध्यम से एक अनुशासित और विनम्र जीवनशैली का मार्ग प्रशस्त किया।

स्थापत्य विशेषताएं

  • नौ मंजिला विशाल संरचना, जो उस काल की शिल्पकला और स्थापत्य कौशल का जीवंत प्रमाण थी।
  • पहाड़ी के ऊपर बना होने के कारण इसे दूर-दूर से देखा जा सकता था, जिससे यह एक प्रभावशाली संरचना बन जाती थी।
  • जैन मंदिर की दीवारों और गुम्बदों पर भगवान महावीर, तपस्वियों, और जैन तीर्थंकरों की सुंदर नक्काशी की गई थी।
  • इसके अंदर बने प्रवचन कक्ष, ध्यान कक्ष, और गर्भगृह विशेष आकर्षण के केंद्र थे।

वर्तमान स्थिति और धार्मिक आस्था

यद्यपि इस भव्य किले/मंदिर को नष्ट कर दिया गया, फिर भी इसके अवशेष, चिन्ह, और धार्मिक महत्व को देखकर आज भी श्रद्धालु यहाँ आते हैं।
यह स्थान जैन समाज के लिए श्रद्धा, बलिदान और गौरव का प्रतीक है।

यहाँ समय-समय पर जैन अनुयायी आस्था के साथ दर्शन करने आते हैं और तेरापंथ की विरासत को याद करते हैं।

कैसे पहुँचें?

  • यह किला राजस्थान में स्थित है (सटीक स्थान विभिन्न स्रोतों में भिन्न पाया जाता है, आमतौर पर इसे राजसमंद या उदयपुर क्षेत्र से संबंधित माना जाता है)।
  • आप उदयपुर या राजसमंद से सड़क मार्ग से वाहन या टैक्सी द्वारा इस स्थल तक पहुँच सकते हैं।
  • निकटतम रेलवे स्टेशन और हवाई अड्डा उदयपुर में स्थित है।

यात्रा सुझाव

  • यदि आप जैन धर्म, प्राचीन स्थापत्य कला, या भारत के लुप्त इतिहास में रुचि रखते हैं, तो यह स्थान अवश्य देखें।
  • पहाड़ी स्थान होने के कारण आरामदायक जूते, पानी, और सूरज की सुरक्षा के उपाय अवश्य रखें।
  • स्थानीय गाइड से इसके ऐतिहासिक प्रसंगों को जानना अनुभव को और भी समृद्ध बनाता है।

निष्कर्ष

दयाल शाह का किला राजस्थान के उस समृद्ध अध्याय का प्रतीक है, जहाँ धर्म, कला और शौर्य एक साथ रहते थे।
यह किला आज भी अपने खंडहरों में हजारों कहानियाँ समेटे खड़ा है – आस्था की, बलिदान की और शौर्य की।
यदि आप कभी राजस्थान की यात्रा पर जाएँ, तो इस गुमनाम किंतु गौरवशाली स्थल को देखना न भूलें – यह न केवल आपके ज्ञान को समृद्ध करेगा, बल्कि आत्मा को भी छू जाएगा।