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राजस्थान के गौरवशाली इतिहास में कई ऐसे गढ़ और किले हैं जो केवल ईंट-पत्थर नहीं, बल्कि अपने भीतर शौर्य, रणनीति और विरासत की कहानियाँ संजोए हुए हैं। इन्हीं में से दो हैं — देवगिरि दुर्ग और ऊटगिर किला, जो आज भी यदुवंशी वंश और करौली राज्य की सैन्य रणनीतियों के साक्षी हैं।

ऊटगिर – अरण्य की ऊंचाई पर बसा योद्धाओं का गढ़

ऊटगिर किला राजस्थान की अरावली पहाड़ियों की एक त्रिकोणीय चोटी पर स्थित है। माना जाता है कि इस दुर्ग का निर्माण लोधा योद्धाओं ने किया था।
यह किला न केवल रणनीतिक दृष्टिकोण से महत्त्वपूर्ण था, बल्कि इसके भौगोलिक स्थान के कारण यह शत्रुओं के लिए दुर्गम भी था।

  • इतिहास में उल्लेख है कि राजा अर्जुन देव ने इस किले को अपने अधिकार में लिया था।
  • उसके बाद यह किला यदुवंशी वंश की राजधानी बना रहा, जब तक कि गोपालदास ने बहादुरपुर किले का निर्माण नहीं किया।

ऊटगिर ने न केवल शासन का केंद्र देखा बल्कि राजनीतिक और सैन्य निर्णयों का केंद्र भी रहा। इसके चारों ओर की संरचना और वास्तुकला आज भी उस युग की विशेषताओं को उजागर करती है।

देवगिरि किला – चंबल की घाटियों में छिपा रक्षक

दूसरी ओर, देवगिरि दुर्ग राजस्थान के सवाई माधोपुर ज़िले में स्थित है, जो करौली राज्य के इतिहास में एक रणनीतिक गढ़ के रूप में जाना जाता है।

  • यह किला करनपुर और खांदर के बीच चंबल नदी की घाटियों में स्थित है, जहाँ से दुश्मनों की गतिविधियों पर नज़र रखना आसान था।
  • करौली राजवंश ने इसे आपातकालीन सैन्य छावनी (Emergency Garrison Fort) के रूप में प्रयोग किया था।

यह किला ऐसा था जहाँ से किसी भी दिशा में सैनिकों की तैनाती की जा सकती थी, और युद्ध के समय मजबूत शरण स्थल का कार्य करता था।

राज्य विलय के बाद का परिवेश

जब 1949 में रियासतों का एकीकरण हुआ और राजस्थान का गठन हुआ, तब यह दोनों किले राज्य संरक्षित स्मारक बन गए। हालाँकि समय के साथ इनका उपयोग कम होता गया, लेकिन इनकी ऐतिहासिक और रणनीतिक महत्ता आज भी उतनी ही मूल्यवान है।

महत्त्वपूर्ण तथ्य (Key Facts)

विवरणऊटगिर किलादेवगिरि दुर्ग
निर्माणलोधा योद्धाओं द्वाराकरौली राज्य द्वारा उपयोग में
प्रमुख शासकराजा अर्जुन देवकरौली राजवंश
युगमध्यकालीन राजस्थान (लगभग 13वीं-15वीं सदी)करौली राज का समय (18वीं सदी तक)
स्थितिअरावली की चोटी परचंबल की घाटियों में
उपयोगयदुवंशी राजधानीआपातकालीन सैन्य किला

आज का परिप्रेक्ष्य

वर्तमान समय में ये किले सांस्कृतिक और पुरातात्त्विक धरोहर के रूप में देखे जाते हैं। यदि इनका सही तरह से संरक्षण और विकास किया जाए, तो ये न केवल पर्यटन के आकर्षण बन सकते हैं, बल्कि यदुवंशी इतिहास के गौरवमयी पन्नों को भी उजागर कर सकते हैं।

निष्कर्ष

देवगिरि और ऊटगिर, राजस्थान के उन अद्वितीय दुर्गों में से हैं, जो न केवल भौगोलिक दृष्टि से विशेष हैं, बल्कि राजनीतिक, सैन्य और सांस्कृतिक महत्व भी रखते हैं।
यदि आप राजस्थान के उन स्थलों को देखना चाहते हैं जो भीड़ से दूर, पर इतिहास से भरपूर हैं, तो इन किलों की यात्रा अवश्य करें।

यह किले आपको राजस्थान की गहराइयों में छिपी एक अनकही गाथा सुनाएँगे – एक ऐसी गाथा जो माटी, पत्थर और वीरता से बुनी गई है।