राजस्थान की वीरभूमि पर स्थित नागौर शहर का हृदय कहलाने वाला “नागौर किला” न सिर्फ स्थापत्य की दृष्टि से अद्भुत है, बल्कि यह अपने भीतर सदियों पुराना इतिहास, युद्धों की गूंज, राजपूती शौर्य और सूफियाना मोहब्बत के किस्से भी संजोए हुए है।
प्राचीनता की परतें
ऐसा कहा जाता है कि नागौर किले की मूल स्थापना दूसरी शताब्दी में नागवंश के शासकों द्वारा की गई थी। ‘नाग’ शब्द स्वयं इस नगर और किले के नाम की जड़ में है। इसके बाद समय के साथ किले ने कई शासकों का उत्थान-पतन देखा। 12वीं शताब्दी के आरंभ में, किले का पुनर्निर्माण चौहान शासकों द्वारा करवाया गया।
इतिहास में दर्ज सबसे महत्त्वपूर्ण मोड़ 12वीं शताब्दी के दौरान आया, जब यह किला राजपूत और मुसलमान शासकों के लिए रणनीतिक रूप से एक महत्त्वपूर्ण ठिकाना बन गया। इसके पश्चात मुगलों के शासनकाल में यह उत्तर भारत में मुगल सत्ता का एक प्रमुख किला बन गया।
राजपूत-मुगल स्थापत्य का बेजोड़ उदाहरण
नागौर किले की वास्तुकला एक अद्वितीय मिश्रण है राजपूती साहस और मुग़ल नज़ाकत का। विशाल प्रवेशद्वार, ऊँची दीवारें, बारीक नक्काशीदार महल, रंगमहल और शीशमहल जैसे परिसर इसकी आंतरिक भव्यता को दर्शाते हैं।
किले के भीतर मौजूद तीन प्रमुख महल हैं:
- अकबरी महल – मुगल सम्राट अकबर द्वारा निर्मित, यह किला मुगलकालीन स्थापत्य शैली का जीता-जागता उदाहरण है।
- दीवान-ए-आम – जहाँ राजा अपने आम जनता से संवाद करते थे।
- हाटी पोल, बख्त सिंह महल, और अमर सिंह महल – राजपूत शासकों द्वारा निर्मित, जिनमें सुंदर चित्रकला, झरोखे और फव्वारे आज भी जीवंत हैं।
2007 की पुनर्स्थापना – पुनः जागता वैभव वर्ष 2007 में, नागौर किला राजस्थान सरकार व अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक संस्थानों के सहयोग से एक बड़े पुनर्निर्माण कार्य का साक्षी बना। इस परियोजना में किले की मूल संरचना, चित्रकला, बाग-बगिचों और जल संरचनाओं को पुनः जीवन प्रदान किया गया।
किले के भीतर लगाए गए फव्वारे, उद्यान और जलाशय इस बात का प्रमाण हैं कि यह किला केवल एक सैनिक दुर्ग नहीं था, बल्कि यह एक सांस्कृतिक और कलात्मक केंद्र भी रहा है।
सूफी संगीत की गूंज
विश्व मंच पर नागौर हर साल नागौर किला एक अद्वितीय सूफी संगीत महोत्सव की मेज़बानी करता है। यहाँ देश-विदेश के प्रसिद्ध सूफी गायकों और कव्वालों की प्रस्तुतियाँ होती हैं। किले की प्राचीरों के बीच, जब रूहानी संगीत गूंजता है, तब यह किला सिर्फ एक ऐतिहासिक इमारत नहीं रह जाता, बल्कि यह प्रेम, आस्था और अध्यात्म का केंद्र बन जाता है।
नागौर किले से जुड़ी कुछ खास बातें
- किला लगभग 36 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है।
- इसमें प्रवेश के चार मुख्य द्वार हैं, जो सुरक्षा की दृष्टि से बनाए गए थे।
- यह वही किला है जिसका ज़िक्र ‘आइन-ए-अकबरी’ में भी मिलता है।
- किले में आज भी भव्य नक्काशीदार दीवारें, छतरियाँ, और रंगीन कांचों से सजे कक्ष मौजूद हैं।
कैसे पहुंचें
नागौर शहर राजस्थान के हृदय में स्थित है और यह जोधपुर, बीकानेर व अजमेर जैसे प्रमुख शहरों से सड़क और रेल मार्ग से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है।
समय और शुल्क
- समय: सुबह 9:00 बजे से शाम 5:00 बजे तक
- प्रवेश शुल्क: भारतीय नागरिक – ₹50, विदेशी नागरिक – ₹100
निष्कर्ष
नागौर किला सिर्फ पत्थरों की इमारत नहीं, बल्कि एक जीवंत दर्पण है राजस्थान के बहुआयामी इतिहास, सांस्कृतिक समृद्धि और स्थापत्य कला का। यह किला बताता है कि कैसे समय, कला और संघर्ष मिलकर एक अमर धरोहर रचते हैं।
यदि आप इतिहास के स्पर्श को महसूस करना चाहते हैं और सूफियाना माहौल में खुद को खो देना चाहते हैं, तो नागौर किला आपकी अगली यात्रा का हिस्सा ज़रूर होना चाहिए।