Select Page

नाथद्वारा, राजस्थान के उदयपुर जिले में स्थित, भारत के प्रमुख वैष्णव तीर्थों में से एक है। यह नगर भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप श्रीनाथ जी के कारण विश्वभर में प्रसिद्ध है। नाथद्वारा का अर्थ है “नाथ का द्वार”, अर्थात वह स्थल जहाँ भक्त अपने आराध्य तक पहुँचते हैं। यहाँ हर वर्ष लाखों श्रद्धालु दर्शन और भक्ति के लिए आते हैं और इस स्थान की दिव्यता का अनुभव करते हैं।

श्रीनाथ जी की प्रतिमा का ऐतिहासिक परिचय

श्रीनाथ जी की मूर्ति मूल रूप से वृंदावन के पास गोवर्धन पर्वत पर स्थापित थी। सत्रहवीं शताब्दी में मुगल शासक औरंगज़ेब ने मंदिरों को नष्ट करने का अभियान शुरू किया। भक्तों ने प्रतिमा को सुरक्षित रखने के लिए इसे आगरा ले जाया, जहाँ यह लगभग छह महीने रही। इसके बाद, प्रतिमा को सुरक्षित स्थान की खोज में मेवाड़ भेजा गया।

महाराणा राजसिंह और नाथद्वारा की स्थापना

कई राजाओं ने सुरक्षा देने से इनकार किया, लेकिन मेवाड़ के महाराणा राजसिंह ने श्रीनाथ जी को आश्रय देने का निर्णय लिया। यात्रा लगभग 32 महीनों तक चली और प्रतिमा अंततः मेवाड़ पहुँची। रास्ते में सिहाड़ नामक स्थान पर रथ का पहिया कीचड़ में फंस गया। महाराणा ने इसे दैवी संकेत माना और उसी स्थान पर मंदिर का निर्माण कराया। सन् 1672 ईस्वी में बनास नदी के तट पर श्रीनाथ जी की स्थापना हुई।

मंदिर की वास्तुकला और स्वरूप

मंदिर का बाहरी स्वरूप राजमहल जैसा प्रतीत होता है, लेकिन भीतर प्रवेश करते ही भक्तों को आध्यात्मिक शांति का अनुभव होता है। श्रीनाथ जी की मूर्ति काले पत्थर की बनी है और मंदिर पुष्टिमार्ग संप्रदाय का प्रमुख केंद्र है। यहाँ सेवा और पूजा एक राजसी बालक रूप में होती है। मंदिर की दीवारों और आंगनों में पारंपरिक चित्रकला और वास्तुकला का उत्कृष्ट मिश्रण देखने को मिलता है।

अष्टयाम सेवा और दर्शन

मंदिर में दिनभर आठ प्रमुख दर्शन होते हैं, जिन्हें अष्टयाम सेवा कहा जाता है। प्रत्येक दर्शन में भगवान के अलग रूप और भोग शामिल होते हैं।

  • मंगल दर्शन – प्रातः आरंभ में श्रृंगार और आराधना
  • शृंगार दर्शन – सुबह भगवान को वस्त्र और श्रृंगार पहनाना
  • राजभोग दर्शन – दोपहर में भव्य भोजन अर्पित करना
  • स्नान दर्शन – भगवान का स्नान और स्वच्छ वस्त्र
  • उत्थापन दर्शन – भगवान को शयन से उठाना
  • भोग दर्शन – दिन में फल, मिठाई और व्यंजन भोग के रूप में
  • संध्या दर्शन – संध्याकालीन पूजा और आरती
  • शयन दर्शन – रात्रि में भगवान का शयन

कला और संस्कृति

नाथद्वारा पिचवाई चित्रकला का प्रमुख केंद्र है। पिचवाई चित्रों में श्रीकृष्ण के जीवन प्रसंगों को सूक्ष्मता और भक्ति भाव से दर्शाया गया है। यह नगर भजन, कीर्तन और सेवा भाव का जीवंत उदाहरण है।

बनास नदी और प्राकृतिक वातावरण

मंदिर बनास नदी के किनारे स्थित होने के कारण माहौल शांत और पवित्र है। यहाँ की प्राकृतिक सुंदरता और आध्यात्मिक ऊर्जा भक्तों को मानसिक शांति प्रदान करती है। नाथद्वारा राजस्थान की आध्यात्मिक राजधानी के रूप में प्रसिद्ध है।

नाथद्वारा कैसे पहुँचे ?

  • सड़क मार्ग – उदयपुर से लगभग 48 किलोमीटर
  • रेल मार्ग – निकटतम रेलवे स्टेशन उदयपुर
  • हवाई मार्ग – निकटतम हवाई अड्डा उदयपुर, जहाँ से टैक्सी या बस उपलब्ध

निष्कर्ष

श्रीनाथ जी नाथद्वारा केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि भक्ति, विश्वास और दिव्य संकेतों की जीवंत कथा है। यह स्थान दर्शाता है कि जब आस्था सच्ची हो, तो भगवान स्वयं अपने भक्तों के बीच निवास करना चाहते हैं। यहाँ आकर ऐसा अनुभव होता है कि श्रीकृष्ण आज भी बालक रूप में भक्तों के बीच उपस्थित हैं।